Durood E Ibrahim In Hindi जानना हर उस मुसलमान के लिए बहुत ज़रूरी है जो अपनी नमाज़ को दिल की गहराई से अदा करना चाहता है। यह वही मुक़द्दस सलावात है जो नबी-ए-करीम ﷺ ने ख़ुद अपने सहाबा-ए-किराम को सिखाई थी।
जब सहाबा ने पूछा कि “या रसूलल्लाह ﷺ, हम आप पर सलावात कैसे भेजें?” तब हुज़ूर ﷺ ने उन्हें Durood E Ibrahim के यही अल्फ़ाज़ सिखाए। इसका ज़िक्र सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम दोनों में मौजूद है। इसीलिए यह सबसे ज़्यादा authentic और मक़बूल दुरूद है।
यह दुरूद हर नमाज़ में तशह्हुद यानी अत्तहिय्यात के बाद पढ़ा जाता है। क़ुरआन-ए-मजीद की सूरह अल-अहज़ाब (33:56) में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है:
“बेशक अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी पर सलावात भेजते हैं। ऐ ईमान वालो! तुम भी उन पर सलावात भेजो और ख़ूब सलाम भेजो।”
यह इलाही हुक्म है, और Durood E Ibrahim इस हुक्म की सबसे मुकम्मल और सही तामील है।
Durood E Ibrahim In Arabic
यह है Durood E Ibrahim In Arabic का मुकम्मल और सही मतन:
اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَعَلَىٰ آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
اللَّهُمَّ بَارِكْ عَلَىٰ مُحَمَّدٍ وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا بَارَكْتَ عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ وَعَلَىٰ آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ
Durood E Ibrahim In Arabic का यह मतन पूरी तरह सही और मुस्तनद है। इसे सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम जैसी मुस्तनद हदीस की किताबों में दर्ज किया गया है।
Durood E Ibrahim In English – Transliteration
जो लोग Arabic script नहीं पढ़ सकते, उनके लिए Durood E Ibrahim In English transliteration यह है। इससे सही तलफ़्फ़ुज़ के साथ दुरूद पढ़ा जा सकता है:
Allahumma salli ‘ala Muhammadin wa ‘ala aali Muhammadin, kama sallayta ‘ala Ibraheema wa ‘ala aali Ibraheema, innaka Hameedun Majeed.
Allahumma barik ‘ala Muhammadin wa ‘ala aali Muhammadin, kama barakta ‘ala Ibraheema wa ‘ala aali Ibraheema, innaka Hameedun Majeed.
इस transliteration की मदद से हर मुसलमान, चाहे वो किसी भी मुल्क या ज़ुबान का हो, Durood E Ibrahim को सही तलफ़्फ़ुज़ के साथ पढ़ सकता है।
Durood E Ibrahim In Hindi – पूरा तर्जुमा
यह है Durood E Ibrahim Ka Tarjuma सरल और आसान हिंदी में:
“ऐ अल्लाह! मुहम्मद ﷺ पर और आल-ए-मुहम्मद पर रहमत नाज़िल फ़रमा, जिस तरह तूने इब्राहीम (अ.स.) और आल-ए-इब्राहीम पर रहमत नाज़िल फ़रमाई। बेशक तू तारीफ़ के लायक़ और बड़ी बुज़ुर्गी वाला है।
ऐ अल्लाह! मुहम्मद ﷺ और आल-ए-मुहम्मद पर बरकत नाज़िल फ़रमा, जिस तरह तूने इब्राहीम (अ.स.) और आल-ए-इब्राहीम पर बरकत नाज़िल फ़रमाई। बेशक तू तारीफ़ के लायक़ और बड़ी बुज़ुर्गी वाला है।”
Durood E Ibrahim In Urdu – तर्जुमा
Durood E Ibrahim In Urdu पढ़ने वालों के लिए तर्जुमा यह है:
“اے اللہ! محمد ﷺ اور آلِ محمد پر رحمت نازل فرما، جیسے تو نے ابراہیم (ع) اور آلِ ابراہیم پر رحمت نازل فرمائی۔ بے شک تو لائقِ تعریف اور بزرگی والا ہے۔
اے اللہ! محمد ﷺ اور آلِ محمد پر برکت نازل فرما، جیسے تو نے ابراہیم (ع) اور آلِ ابراہیم پر برکت نازل فرمائی۔ بے شک تو لائقِ تعریف اور بزرگی والا ہے۔”
Durood E Ibrahim Ka Tarjuma – लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ समझिए
Durood E Ibrahim Ka Tarjuma लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़ समझने से इसकी रूहानियत और गहरी हो जाती है:
| अरबी लफ़्ज़ | हिंदी में मतलब |
|---|---|
| اللَّهُمَّ | ऐ अल्लाह |
| صَلِّ | रहमत भेज / सलावात भेज |
| عَلَىٰ مُحَمَّدٍ | मुहम्मद ﷺ पर |
| وَعَلَىٰ آلِ مُحَمَّدٍ | और आल-ए-मुहम्मद पर |
| كَمَا صَلَّيْتَ | जैसे तूने भेजा |
| عَلَىٰ إِبْرَاهِيمَ | इब्राहीम (अ.स.) पर |
| إِنَّكَ حَمِيدٌ | बेशक तू तारीफ़ वाला है |
| مَجِيدٌ | और अज़मत वाला है |
| بَارِكْ | बरकत दे |
Durood E Ibrahim की अहमियत – यह क्यों ख़ास है?
Durood E Ibrahim कोई आम दुआ नहीं है। यह वह सलावात है जो ख़ुद नबी-ए-करीम ﷺ ने अपने सहाबा को सिखाई। इसीलिए इसे तमाम दुरूदों में सबसे अफ़ज़ल और मुकम्मल माना जाता है।
हज़रत इब्राहीम (अ.स.) का इसमें ज़िक्र इसलिए आया क्योंकि इसरा-व-मेराज की रात उन्होंने नबी-ए-करीम ﷺ से कहा था: “या मुहम्मद! अपनी उम्मत को मेरी तरफ़ से सलाम कहना।” अल्लाह तआला ने उनकी इस मुहब्बत का बदला यह दिया कि क़यामत तक हर मुसलमान की हर नमाज़ में हज़रत इब्राहीम (अ.स.) का नाम लिया जाता रहेगा।
इसके अलावा हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने क़ुरआन में दुआ की थी कि उनकी नस्ल में एक रसूल भेजा जाए। अल्लाह ने यह दुआ क़बूल की और नबी-ए-करीम ﷺ को मबऊस फ़रमाया। इसीलिए Durood E Ibrahim में उनका ज़िक्र इज़्ज़त और क़द्र के साथ किया गया है।
Disclaimer: यह वेबसाइट/आर्टिकल केवल इस्लामी जानकारी और दीनी तालीम के मक़सद से लिखा गया है। यहाँ दी गई तमाम दुआएं, हदीसें और इस्लामी मालूमात मुस्तनद इस्लामी मसादिर जैसे क़ुरआन-ए-मजीद, सहीह बुख़ारी, सहीह मुस्लिम और दीगर मुस्तनद हदीस की किताबों से ली गई हैं।
Durood E Ibrahim कब पढ़ें – सही वक़्त
Durood E Ibrahim का कोई ख़ास वक़्त मुक़र्रर नहीं, लेकिन कुछ मौक़े ख़ास तौर पर अफ़ज़ल हैं:
नमाज़ में: हर नमाज़ के तशह्हुद (अत्तहिय्यात) के बाद Durood E Ibrahim पढ़ना ज़रूरी है। यह नमाज़ का एक अहम हिस्सा है।
जुमुअ (जुमा) के दिन: हदीस में आया है कि जुमे के दिन कसरत से दुरूद पढ़ना चाहिए। यह दिन ख़ुसूसी तौर पर मक़बूल है।
दुआ से पहले और बाद में: किसी भी दुआ को पढ़ने से पहले और दुआ के ख़त्म होने पर Durood E Ibrahim पढ़ना दुआ की क़बूलियत के लिए बहुत मुफ़ीद है।
अज़ान के बाद: अज़ान सुनने के बाद दुरूद पढ़ना सुन्नत है।
रात को सोने से पहले: रात को सोने से पहले कसरत से दुरूद पढ़ना रूहानियत को ताक़त देता है।
हर वक़्त ज़िक्र के तौर पर: जब भी दिल चाहे, Durood E Ibrahim पढ़ा जा सकता है। इसका कोई वक़्त महदूद नहीं है।
Durood E Ibrahim Benefits – रूहानी फ़ायदे
Durood E Ibrahim Benefits हदीस-ए-मुबारक से साबित हैं। यह कोई मन-घड़त बात नहीं, बल्कि मुस्तनद इस्लामी मसादिर पर मबनी है:
1. क़यामत के दिन नबी ﷺ की क़ुर्बत हज़रत मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया: “क़यामत के दिन मुझसे सबसे क़रीब वह शख़्स होगा जिसने मुझ पर सबसे ज़्यादा दुरूद भेजा हो।” (तिर्मिज़ी)
2. दस गुना रहमत का नुज़ूल जिसने एक मर्तबा दुरूद पढ़ा, अल्लाह तआला उस पर दस मर्तबा रहमत नाज़िल फ़रमाता है। यह हदीस में सराहत के साथ आया है।
3. गुनाहों की माफ़ी Durood E Ibrahim पढ़ना गुनाहों के कफ़्फ़ारे और माफ़ी का ज़रिया है।
4. दुआ की क़बूलियत दुआ से पहले और बाद में दुरूद पढ़ने से दुआ की मक़बूलियत बढ़ जाती है। उलमा ने फ़रमाया है कि जो दुआ दुरूद के साथ शुरू और ख़त्म हो, वह दुआ रद नहीं होती।
5. नबी ﷺ से मुहब्बत में इज़ाफ़ा Durood E Ibrahim का बराबर पढ़ना दिल में नबी-ए-करीम ﷺ की मुहब्बत को गहरी करता है, जो हर मुसलमान का फ़र्ज़ है।
6. दुनिया और आख़िरत में बरकत कसरत-ए-दुरूद से इंसान की ज़िंदगी, रिज़्क़ और घर में बरकत आती है।
7. क़यामत के अंधेरे में नूर हदीस में है कि दुरूद पढ़ने वाले के लिए पुल-ए-सिरात पर रोशनी होगी।
Durood E Ibrahim Ki Fazilat – क़ुरआन और हदीस की रोशनी में
Durood E Ibrahim Ki Fazilat को समझने के लिए क़ुरआन और हदीस पर नज़र डालना ज़रूरी है।
अल्लाह तआला ने सूरह अल-अहज़ाब (33:56) में ख़ुद यह हुक्म दिया है कि नबी ﷺ पर सलावात भेजी जाए। जब ख़ुद अल्लाह और उसके फ़रिश्ते नबी ﷺ पर सलावात भेजते हैं, तो यह अपने आप में Durood E Ibrahim Ki Fazilat की सबसे बड़ी दलील है।
हदीस-ए-पाक में नबी-ए-करीम ﷺ ने फ़रमाया: “जो मुझ पर एक मर्तबा दुरूद भेजे, अल्लाह उस पर दस रहमतें नाज़िल फ़रमाता है, उसके दस गुनाह माफ़ होते हैं, और उसके दस दर्जे बुलंद होते हैं।” (नसाई)
यह Durood E Ibrahim Ki Fazilat का वह पहलू है जो हर मुसलमान को इसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में शामिल करने पर मजबूर करता है।
Durood E Ibrahim पढ़ने का सही तरीक़ा
Durood E Ibrahim पढ़ने का सही तरीक़ा यह है:
- वुज़ू के साथ पढ़ना बेहतर है, ख़ास कर नमाज़ में।
- दिल की तवज्जुह के साथ पढ़ें – सिर्फ़ ज़ुबान से नहीं।
- सही तलफ़्फ़ुज़ का ख़याल रखें। Durood E Ibrahim In English transliteration use करके practice करें।
- नमाज़ में तशह्हुद के बाद मुकम्मल दुरूद पढ़ें।
- नमाज़ के बाहर कसरत से पढ़ें, कोई पाबंदी नहीं।
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निष्कर्ष – Durood E Ibrahim की अहमियत
Durood E Ibrahim सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का मजमूआ नहीं है। यह एक मुक़द्दस रिश्ता है मुसलमान और उनके प्यारे नबी ﷺ के दरमियान। जब भी कोई Durood E Ibrahim In Hindi, Durood E Ibrahim In Arabic, या किसी भी ज़ुबान में समझ कर पढ़ता है, तो वह अल्लाह के हुक्म की तामील करता है, नबी ﷺ की सुन्नत को ज़िंदा करता है, और अपने लिए रहमत और बरकत की राह खोलता है।
Durood E Ibrahim Benefits और Durood E Ibrahim Ki Fazilat हदीस-ए-सहीह से साबित हैं। इसे नमाज़ में अदा करना और ज़िंदगी में कसरत से पढ़ना एक अज़ीम नेमत है जो अल्लाह तआला ने हर मुसलमान को दी है।
अल्लाह तआला हम सबको इस मुक़द्दस दुरूद को समझ कर और दिल की गहराई से पढ़ने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
अक्सर पूछे जाने वाले सवालात (FAQs)
Q1. क्या Durood E Ibrahim नमाज़ में फ़र्ज़ है?
जुमहूर उलमा के नज़दीक Durood E Ibrahim का नमाज़ में पढ़ना सुन्नत-ए-मुअक्कदह या वाजिब है। इसे छोड़ना मकरूह है।
Q2. क्या Durood E Ibrahim रोज़ पढ़ना चाहिए?
जी हाँ। जुमे के दिन कसरत से पढ़ना ख़ास तौर पर अफ़ज़ल है, लेकिन रोज़ भी पढ़ा जा सकता है।
Q3. Durood E Ibrahim और दुरूद शरीफ़ में क्या फ़र्क़ है?
दुरूद शरीफ़ एक आम नाम है हर उस दुआ का जो नबी ﷺ पर भेजी जाए। Durood E Ibrahim उस ख़ास दुरूद का नाम है जो नमाज़ में पढ़ा जाता है और सबसे authentic है।
Q4. क्या ख़वातीन भी Durood E Ibrahim पढ़ सकती हैं?
बिल्कुल। ख़वातीन भी नमाज़ में और बाहर Durood E Ibrahim पढ़ सकती हैं। कोई पाबंदी नहीं।
Q5. क्या Durood E Ibrahim पढ़ने से दुआ क़बूल होती है?
उलमा का कहना है कि जो दुआ दुरूद के साथ शुरू और ख़त्म हो, वह दुआ बीच में नहीं अटकती। अल्लाह की रहमत से वह क़बूल होती है।
Q6. Durood E Ibrahim कितनी मर्तबा पढ़ें?
इसका कोई मुक़र्रर अदद नहीं है। जितना हो सके उतना पढ़ें। जुमे को ख़ास मेहनत से ज़्यादा पढ़ें।