इंसान की ज़िंदगी में कई मोड़ ऐसे आते हैं जब वो अल्लाह के सिवा किसी से मदद नहीं माँग सकता। बीमारी हो, माली तंगी हो, रिश्तों में दूरी हो या दिल की कोई ख़्वाहिश हर हाल में मुसलमान अल्लाह की बारगाह में हाथ उठाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोगों की दुआएँ फ़ौरन क़बूल हो जाती हैं जबकि कुछ को इंतज़ार करना पड़ता है?
Dua qabool hone ki dua सिर्फ़ एक फ़ॉर्मूला नहीं है यह अल्लाह से रिश्ते को मज़बूत करने, अपनी ग़लतियों को पहचानने और सच्चे दिल से माँगने का तरीक़ा है। क़ुरआन में अल्लाह फ़रमाता है:
“وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ”
(सूरह ग़ाफ़िर: 60)
अनुवाद: “तुम्हारे रब ने फ़रमाया: मुझसे दुआ करो, मैं क़बूल करूँगा।”
इस लेख में हम आपको वो तमाम दुआएँ, तरीक़े और अमल बताएँगे जो आपकी दुआओं को अल्लाह के दरबार में मक़बूल बना सकते हैं।
Dua Qabool Hone Ki Dua अरबी, उर्दू और हिंदी में
मुख्य दुआ (क़ुरआन और हदीस से)
अरबी:
“رَبَّنَا تَقَبَّلْ مِنَّا ۖ إِنَّكَ أَنتَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ”
तर्जुमा (Transliteration):
“Rabbana taqabbal minna innaka antas-Samee’ul-‘Aleem”
हिंदी अनुवाद:
“ऐ हमारे रब! हमसे क़बूल फ़रमा, बेशक तू ही सुनने वाला और जानने वाला है।”
स्रोत: सूरह अल-बक़रह (2:127) यह दुआ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और इस्माईल अलैहिस्सलाम ने काबा की तामीर के वक़्त की थी।
दुआ की क़ुबूलियत के लिए क़ुरआनी दुआ (सूरह इब्राहीम)
अरबी:
“رَبِّ اجْعَلْنِي مُقِيمَ الصَّلَاةِ وَمِن ذُرِّيَّتِي ۚ رَبَّنَا وَتَقَبَّلْ دُعَاءِ”
तर्जुमा:
“Rabbi-j’alni muqeemas-salaati wa min dhurriyyati, Rabbana wa taqabbal du’aa”
हिंदी अनुवाद:
“ऐ मेरे रब! मुझे और मेरी औलाद को नमाज़ क़ायम रखने वाला बना। ऐ हमारे रब! मेरी दुआ क़बूल फ़रमा।”
स्रोत: सूरह इब्राहीम (14:40)
दुआ क़बूल होने के लिए रसूलुल्लाह ﷺ की सिखाई दुआ
अरबी:
“اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ بِأَنَّ لَكَ الْحَمْدَ لَا إِلَهَ إِلَّا أَنْتَ الْمَنَّانُ بَدِيعُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ يَا ذَا الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ يَا حَيُّ يَا قَيُّومُ”
तर्जुमा:
“Allahumma inni as’aluka bi-anna lakal-hamdu la ilaha illa antal-Mannanu Badee’us-samawati wal-ard, ya Dhal-Jalali wal-Ikram, ya Hayyu ya Qayyum”
हिंदी अनुवाद:
“ऐ अल्लाह! मैं तुझसे माँगता हूँ इस वास्ते से कि तेरे ही लिए तमाम तारीफ़ें हैं, तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू एहसान करने वाला है, आसमानों और ज़मीन का बनाने वाला है। ऐ जलाल और इकराम वाले! ऐ हमेशा ज़िंदा रहने वाले! ऐ क़ायम रहने वाले!”
स्रोत: सुनन अबू दाऊद (1495), सुनन इब्ने माजाह (3858)
फ़ायदा: रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि जो शख़्स इस दुआ से अल्लाह से माँगे, उसकी दुआ क़बूल हो जाती है। इसे इस्मे आज़म (अल्लाह का सबसे बड़ा नाम) की दुआ भी कहा जाता है।
Dua Qabool Hone Ki Tasbeeh: तस्बीह का तरीक़ा
तस्बीह का मतलब: अल्लाह की तस्बीह करना यानी उसकी पाकी बयान करना और उसे हर ऐब से पाक समझना। दुआ से पहले तस्बीह करने से दुआ की क़ुबूलियत बढ़ जाती है।
दुआ से पहले पढ़ी जाने वाली तस्बीह:
अरबी:
“سُبْحَانَ اللَّهِ وَالْحَمْدُ لِلَّهِ وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ وَاللَّهُ أَكْبَرُ”
तर्जुमा:
“Subhanallahi walhamdulillahi wa la ilaha illallahu wallahu Akbar”
हिंदी अनुवाद:
“अल्लाह पाक है, सारी तारीफ़ अल्लाह के लिए है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, और अल्लाह सबसे बड़ा है।”
तरीक़ा:
- दुआ से पहले 33 बार “सुबहानल्लाह”
- 33 बार “अल-हम्दुलिल्लाह”
- 33 बार “अल्लाहु अकबर”
- 1 बार “ला इलाहा इल्लल्लाहु वहदहू ला शरीका लहू, लहुल-मुल्कु व लहुल-हम्दु व हुवा अला कुल्लि शय्इन क़दीर”
स्रोत: सहीह मुस्लिम (597)
दुरूद शरीफ़ (दुआ से पहले और बाद में)
अरबी:
“اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ مُحَمَّدٍ كَمَا صَلَّيْتَ عَلَى إِبْرَاهِيمَ وَعَلَى آلِ إِبْرَاهِيمَ إِنَّكَ حَمِيدٌ مَجِيدٌ”
तर्जुमा:
“Allahumma salli ‘ala Muhammadin wa ‘ala ali Muhammadin kama sallaita ‘ala Ibrahima wa ‘ala ali Ibrahima, innaka Hameedum-Majeed”
हिंदी अनुवाद:
“ऐ अल्लाह! मुहम्मद ﷺ और उनकी आल पर रहमत नाज़िल फ़रमा जैसे तूने इब्राहीम अलैहिस्सलाम और उनकी आल पर रहमत नाज़िल फ़रमाई। बेशक तू तारीफ़ के लायक़ और बुलंद मर्तबे वाला है।”
अहमियत: दुआ दुरूद के बीच में होती है यानी दुआ से पहले और बाद में दुरूद पढ़ना ज़रूरी है। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“हर दुआ (क़ुबूलियत से) रोक दी जाती है जब तक नबी ﷺ पर दुरूद न भेजा जाए।”
(तिर्मिज़ी: 486)
Dua Qabool Hone Ki Dua In Urdu – उर्दू में दुआएँ
उर्दू में दुआ:
“اے میرے رب! میری دعا قبول فرما، بے شک تو سننے والا اور جاننے والا ہے”
तर्जुमा:
“Ae mere Rabb! Meri dua qabool farma, be-shak tu sunne wala aur janne wala hai”
उर्दू में तस्बीह:
“سبحان اللہ، الحمد للہ، لا الہ الا اللہ، اللہ اکبر”
इन तस्बीहात को दुआ से पहले पढ़ने से दिल में ख़ुशूअ और अल्लाह से क़ुर्बत पैदा होती है।
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दुआ क़बूल होने के वक़्त और हालात
इस्लाम में कुछ ख़ास वक़्त और हालात ऐसे हैं जब दुआएँ ज़्यादा क़बूल होती हैं:
आख़िरी तिहाई रात (तहज्जुद का वक़्त)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“हमारा रब (अल्लाह) हर रात आसमाने दुनिया पर नाज़िल होता है जब रात का आख़िरी तिहाई हिस्सा बाक़ी रहता है और फ़रमाता है: कौन है जो मुझसे माँगे तो मैं उसे दूँ? कौन है जो मुझसे दुआ करे तो मैं क़बूल करूँ?”
(सहीह बुख़ारी: 1145, सहीह मुस्लिम: 758)
अमल: फ़ज्र से 1-2 घंटे पहले उठकर तहज्जुद पढ़ें और दुआ करें।
सजदे की हालत में
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“बंदा अपने रब के सबसे ज़्यादा क़रीब होता है जब वो सजदे में होता है, इसलिए (सजदे में) ख़ूब दुआ करो।”
(सहीह मुस्लिम: 482)
अज़ान और इक़ामत के दरमियान
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“अज़ान और इक़ामत के बीच की दुआ रद्द नहीं होती।”
(सुनन अबू दाऊद: 521, तिर्मिज़ी: 212)
जुमे के दिन एक ख़ास वक़्त
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“जुमे के दिन एक ऐसी घड़ी है कि अगर कोई मुसलमान उस वक़्त अल्लाह से कुछ माँगे तो अल्लाह ज़रूर उसे देता है।”
(सहीह बुख़ारी: 935, सहीह मुस्लिम: 852)
उलमा की राय: यह वक़्त इमाम के ख़ुत्बे के लिए बैठने से लेकर नमाज़ ख़त्म होने तक है, या असर के बाद से मग़रिब तक।
बारिश के वक़्त
रसूलुल्लाह ﷺ के ज़माने में सहाबा बारिश के वक़्त दुआ करते थे क्योंकि यह रहमत के नाज़िल होने का वक़्त है।
सफ़र की हालत में
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“तीन दुआएँ रद्द नहीं होतीं: बाप की दुआ अपने बेटे के लिए, रोज़ेदार की दुआ और मुसाफ़िर की दुआ।”
(सुनन इब्ने माजाह: 1752 हसन)
रोज़े के वक़्त (ख़ासकर इफ़्तार से पहले)
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“रोज़ेदार की दुआ इफ़्तार के वक़्त रद्द नहीं होती।”
(सुनन इब्ने माजाह: 1753)
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दुआ क़बूल न होने की वजूहात और क्या करें?
कभी-कभी दुआएँ फ़ौरन क़बूल नहीं होतीं। इसकी कुछ वजूहात:
हराम की कमाई
रसूलुल्लाह ﷺ ने एक शख़्स का ज़िक्र किया जो सफ़र में है, बाल बिखरे हुए हैं, ग़ुबार से अटा हुआ है, आसमान की तरफ़ हाथ उठाकर कहता है “या रब! या रब!” लेकिन उसका खाना हराम, पीना हराम, लिबास हराम और हराम से पला बढ़ा है तो उसकी दुआ कैसे क़बूल हो?
(सहीह मुस्लिम: 1015)
समाधान: हलाल कमाई करें, हराम से बचें।
दिल में यक़ीन की कमी
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“अल्लाह से दुआ करो इस हाल में कि तुम्हें यक़ीन हो कि (अल्लाह) क़बूल करेगा।”
(तिर्मिज़ी: 3479)
समाधान: पूरे यक़ीन के साथ दुआ करें, शक न करें।
दुआ में जल्दबाज़ी
रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
“तुम में से किसी की दुआ क़बूल की जाती है जब तक वो जल्दबाज़ी न करे और कहे: मैंने दुआ की लेकिन क़बूल नहीं हुई।”
(सहीह बुख़ारी: 6340, सहीह मुस्लिम: 2735)
समाधान: सब्र रखें, बार-बार दुआ करते रहें।
गुनाहों में लिप्त रहना
गुनाह दुआ और अल्लाह के बीच परदा बन जाते हैं।
समाधान: तौबा करें, इस्तिग़फ़ार पढ़ें:
“أَسْتَغْفِرُ اللَّهَ الَّذِي لَا إِلَهَ إِلَّا هُوَ الْحَيُّ الْقَيُّومُ وَأَتُوبُ إِلَيْهِ”
“Astaghfirullahallazi la ilaha illa Huwal-Hayyul-Qayyumu wa atubu ilayh”
“मैं अल्लाह से माफ़ी माँगता हूँ जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, जो हमेशा ज़िंदा और क़ायम रहने वाला है, और मैं उसकी तरफ़ रुजू करता हूँ।”
दुआ क़बूल होने के आदाब
| आदाब | तफ़सील |
|---|---|
| वुज़ू की हालत में दुआ करें | पाक होकर दुआ करना बेहतर है |
| क़िबला की तरफ़ मुँह करें | जहाँ मुमकिन हो |
| हाथ उठाकर दुआ करें | दोनों हाथ सीने की सीध में उठाएँ |
| दुआ में इख़लास | दिखावे के लिए नहीं, सिर्फ़ अल्लाह के लिए |
| अल्लाह की हम्द व सना से शुरू करें | “अल-हम्दुलिल्लाहि रब्बिल आलमीन” |
| नबी ﷺ पर दुरूद भेजें | दुआ से पहले और बाद में |
| आहिस्ता आवाज़ में | ज़ोर से चिल्लाने की ज़रूरत नहीं |
दुआ में क्या माँगें? सही नीयत
दुआ करते वक़्त दुनिया और आख़िरत दोनों की भलाई माँगें:
अरबी:
“رَبَّنَا آتِنَا فِي الدُّنْيَا حَسَنَةً وَفِي الْآخِرَةِ حَسَنَةً وَقِنَا عَذَابَ النَّارِ”
तर्जुमा:
“Rabbana atina fid-dunya hasanatan wa fil-akhirati hasanatan wa qina ‘adhaban-Nar”
हिंदी अनुवाद:
“ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भलाई दे और आख़िरत में भी भलाई दे और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।”
स्रोत: सूरह अल-बक़रह (2:201)
यह रसूलुल्लाह ﷺ की सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली दुआओं में से एक थी।
दुआ में देरी की हिकमत (अल्लाह की तदबीर)
अल्लाह हर दुआ सुनता है और तीन में से एक तरीक़े से जवाब देता है:
फ़ौरन क़बूल करता है (जो माँगा वो मिल जाता है)
दुनिया की मुसीबत टाल देता है (जो नुक़सान होने वाला था वो नहीं होता)
आख़िरत के लिए बचा लेता है (क़यामत के दिन वो दुआ नेकियों में तब्दील होकर मिलती है)
इसलिए कभी मायूस न हों हर दुआ रजिस्टर है, कोई दुआ ज़ाया नहीं जाती।
निष्कर्ष
Dua qabool hone ki dua सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि अल्लाह से रिश्ते को गहरा करने का ज़रिया है। जब आप अल्लाह से माँगते हैं तो आप उसकी रहमत, उसकी क़ुदरत और उसके करम का इक़रार करते हैं। दुआ इबादत है और हर मुसलमान का हक़ है।
आज से ही शुरू करें:
- फ़ज्र से पहले उठें और तहज्जुद में दुआ करें
- सजदे को लंबा करें और दिल खोलकर अपने रब से बात करें
- हलाल कमाई पर ध्यान दें
- सब्र और यक़ीन को अपनी ढाल बनाएँ
- दुरूद शरीफ़ को अपनी रोज़ की आदत बनाएँ
याद रखें: अल्लाह आपसे सिर्फ़ 7 आसमान की दूरी पर नहीं, बल्कि आपकी शहरग से भी ज़्यादा क़रीब है। आप जब भी पुकारें, वो सुनता है। बस ज़रूरत है सच्चे दिल, साफ़ नीयत और पक्के यक़ीन की।
“وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ”
(सूरह अल-बक़रह: 186)
“जब मेरे बन्दे तुमसे मेरे बारे में पूछें तो (कह दो कि) मैं क़रीब हूँ। पुकारने वाले की पुकार का जवाब देता हूँ जब वो मुझे पुकारता है।”
अल्लाह आपकी तमाम जायज़ दुआओं को क़बूल फ़रमाए। आमीन
अक़्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
क्या दुआ क़बूल होने के लिए अरबी में पढ़ना ज़रूरी है?
नहीं, अल्लाह सभी ज़बानें समझता है। आप अपनी मातृभाषा में भी दुआ कर सकते हैं। लेकिन क़ुरआन और हदीस की दुआएँ अरबी में पढ़ना ज़्यादा सवाब वाला है क्योंकि यह नबी ﷺ की सुन्नत है।
दुआ कितनी बार पढ़नी चाहिए?
कोई तय तादाद नहीं है। आप जितनी मर्ज़ी बार दुआ कर सकते हैं। रसूलुल्लाह ﷺ अहम दुआओं को 3 बार दोहराते थे।
क्या दुआ सिर्फ़ नमाज़ में ही करनी चाहिए?
नहीं, आप किसी भी वक़्त, कहीं भी दुआ कर सकते हैं। हालाँकि नमाज़ (ख़ासकर सजदे) में दुआ ज़्यादा क़बूल होती है।
अगर दुआ बार-बार करने के बाद भी क़बूल न हो तो?
सब्र रखें और यक़ीन रखें कि अल्लाह आपके लिए बेहतर फ़ैसला कर रहा है। हो सकता है जो आप माँग रहे हैं वो आपके लिए नुक़सानदेह हो, या अल्लाह बेहतर वक़्त का इंतज़ार कर रहा हो।
क्या औरतें हैज़ (माहवारी) के दौरान दुआ कर सकती हैं?
हाँ, बिल्कुल। दुआ किसी भी वक़्त की जा सकती है। सिर्फ़ क़ुरआन को छूना या नमाज़ पढ़ना इस हालत में मना है, दुआ नहीं।
दुआ क़बूल होने में कितना वक़्त लगता है?
यह अल्लाह की मर्ज़ी पर निर्भर है। कभी फ़ौरन, कभी महीनों या सालों बाद। लेकिन कोई दुआ ज़ाया नहीं जाती यह अल्लाह का वादा है।
क्या गैर-मुस्लिम की दुआ क़बूल होती है?
अल्लाह का दरवाज़ा सबके लिए खुला है। लेकिन जो शख़्स तौहीद (अल्लाह की वहदानियत) पर ईमान नहीं रखता, उसकी दुआओं के क़बूल होने की गारंटी नहीं है। इस्लाम क़बूल करना सबसे बड़ी दुआ की क़ुबूलियत है।